अफ़साना लिख रही
हूँ, दिल-ए-बेकरार का
आँखों मेी रंग
भर के तेरे
इंतजार का
जब तू नही
तो कुछ भी
नही हैं बहार
में
जी चाहता हैं मुँह
भी ना देखू
बहार का
हासिल हैं यूँ
तो मुझ को
जमाने की दौलते
लेकिन नसीब लाई
हूँ एक सोगवार
का
आजा के अब
तो आँख में
आँसू भी आ
गये
सागर छलक उठा
मेरे सबर-ओ-करार का
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